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भारत :संरचना एवं भू आकृति प्रदेश प्रस्तावना भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान भूवैज्ञानिक संरचना व इसके क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रम मुख्यतः  अंतर्जनित व बहिर्जनिक बलों व प्लेट के क्षैतिज संचरण की अंतः क्रिया  के परिणाम स्वरुप अस्तित्व में आए हैं. भूवैज्ञानिक संरचना व शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है जो भौतिक लक्षणों पर आधारित है- प्रायद्वीपीय खंड हिमालय और अन्य अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वत मालाएं सिंधु गंगा ब्रह्मपुत्र मैदान प्रायद्वीपीय खंड प्रायद्वीप खंड की उत्तरी सीमा कटी-फटी है, जो  कच्छ से आरंभ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के समानांतर राजमहल की पहाड़ियों व गंगा डेल्टा  तक जाती है. इसके अतिरिक्त उत्तर पूर्व में  कर्वी एन्ग्लोंग व मेघालय का पठार तथा पश्चिम में राजस्थान  भी इसी खंड के विस्तार हैं. पश्चिम बंगाल में मालदा भ्रंश उत्तरी पूर्व भाग में स्थित मेघालय व कर्वी एन्ग्लोंग पठार को छोटा नागपुर पठार  से अलग करता है. राजस्थान में यह प्रायद...

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उत्तरी भारत का मैदान प्रस्तावना उत्तरी भारत का मैदान  हिमालय के दक्षिण कोई 2400 किलोमीटर में पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ है. इसकी चौड़ाई 240 से 500 किलोमीटर है. इसका क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किलोमीटर है. सबसे कम चौड़ाई पूर्वी भाग में मिलती है. यह मैदान समतल है, और यहाँ कोई पर्वत नहीं है. सिंधु, गंगा, और ब्रह्मपुत्र तथा इसकी सहायक नदियों के जल ओर निक्षेपों से बना यह विशाल मैदान 250 मीटर से भी कम ऊँचा और अत्यंत उपजाऊ है. इसका निर्माण हिमालय तथा दक्षिणी पठार की नदियों के जल और निक्षेपों से हुआ है. इस मैदान में जलोढ़ निक्षेपों की मोटाई 2000 मीटर से भी अधिक है. यह विशाल मैदान एक इकाई होते हुए भी चार उपविभागों में बटा है– 1. पंजाब का मैदान 2.राजस्थान का मैदान 3.गंगा का मैदान और 4.ब्रह्मपुत्र का मैदान. पंजाब का मैदान उत्तरी विशाल मैदान का यह सबसे पश्चिमी भाग है. पांच प्रमुख नदियों  झेलम, चिनाव, रावी, सतलुज और व्यास  का जल प्राप्त करने के कारण यह पंजाब कहलाता है. रावी और व्यास के दोआब को ऊपरी बारी दोआब तथा व्यास और सतलुज के दोआब को विस्ट दोआब कहा जाता है. इसके उत्तर...

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प्रस्तावना भारत की जलवायु उष्ण मानसूनी है जो दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया में पाई जाती है. मानसून से अभिप्राय ऐसी जलवायु से है जिसमें ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा में उत्क्रमण हो जाता है. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक भारत की जलवायु को नियंत्रित करने वाले अनेक कारक हैं जिन्हें मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है- स्थिति तथा उच्चावच संबंधी कारक तथा वायुदाब एवं पवन संबंधी कारक स्थिति एवं उच्चावच संबंधी कारक अक्षांश – भारत की मुख्य भूमि का अक्षांशीय विस्तार – 6°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक एवं देशांतरीय विस्तार 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक हैं. भारत में कर्क रेखा पूर्व पश्चिम दिशा में देश के मध्य भाग से गुजरती है. इस प्रकार भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण कटिबंध में और कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित भाग उष्ण कटिबंध में पड़ता है. उष्ण कटिबंध भूमध्य रेखा के अधिक निकट होने के कारण सारा साल ऊंचे तापमान और कम दैनिक और वार्षिक तापांतर का अनुभव करता है. कर्क रेखा से उत्तर स्थित भाग में भूमध्य रेखा से दूर होने के कारण उच्च दैन...

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भारतीय मानसून की प्रकृति दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वर्षा के कारणों का व्यवस्थित अध्ययन मानसून के कारणों को समझने में सहायता करता है इसके कुछ विशेष पक्ष इस प्रकार हैं- मानसून का आरंभ तथा उसका स्थल की ओर बढ़ना वर्षा लाने वाले तंत्र (उदाहरणत: उष्णकटिबंधीय चक्रवात) तथा मानसूनी वर्षा की आवृति एवं वितरण के बीच संबंध. मानसून में विच्छेद मानसून का आरंभ गर्मी के महीने में स्थल और समुद्र का विभेदी तापन ही मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है. अप्रैल और मई के महीने में जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है तो हिंद महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखंड अत्यधिक गर्म हो जाता है, इसके परिणाम स्वरुप उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी भाग पर एक गहन न्यून दाब क्षेत्र विकसित हो जाता है, क्योंकि भूखंड के दक्षिण में हिंद महासागर अपेक्षतया धीरे-धीरे गर्म होता है. निम्न वायुदाब केंद्र विषुवत रेखा के उस पार से दक्षिण पूर्वी सन्मार्ग पवनों को आकर्षित कर लेता है. इन दशाओं में अंतःउष्ण कटिबंधीय अभिसरन क्षेत्र उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है. इस प्रकार दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी प...

कागज-उद्योग

कागज उद्योग देश की प्रथम असफल कागज मिल 1832 में सेरामपुर (बंगाल) में स्थापित की गयी। बाद में, 1870 में बालीगंज (कोलकाता के निकट) में पुनः एक मिल की स्थापना की गयी। किंतु कागज उद्योग का नियोजित विकास स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही संभव हो सका। कागज उद्योग हेतु  बांस, गूदा, छीजन, सलाई व सबाई घास, व्यर्थ कागज  इत्यादि कच्चे माल की जरूरत होती है। उद्योग की अवस्थिति कच्चे माल तथा कुछ सीमा तक बाजार द्वारा प्रभावित होती है। 1950 में, यहां 17 पेपर मिल थीं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 1.6 लाख टन थी। वर्तमान में, देश में 515 कागज मिलें हैं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 7.4 मिलियन टन है। देश में 112 न्यूजप्रिंट मिलें हैं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 1.69 मिलियन टन है। कागज उद्योग का एक महत्वपूर्ण पहलू है- लघु कागज मिलों की सशक्त उपस्थिति। ये कागज उद्योग की कुल क्षमता का 50 प्रतिशत रखते हैं और देश में पेपर और पेपरबोर्ड के उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत का योगदान करते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के कागज उद्योग को विश्व के 15 सर्वोच्च पेपर उद्योगों में दर्जा हासिल है। अच्छी गु...

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भारतीय कृषि को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है: स्थानांतरण कृषि कृषि की इस पद्धति के तहत किसान अपने परिवार की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृषि करता है। यदि अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद खाद्यान्न बच जाता है, तो उसका उपयोग अन्य वस्तुओं के लेन-देन में किया जाता है। स्थानांतरण कृषि में क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था लगभग स्थायी होती है और उसका आधार पूर्णतया ग्रामीण उत्पादन ही होता है। इस प्रकार कृषि के लिए भूमि का निर्माण अधिकांशतः जंगलों में आग लगाकर किया जाता है। इस प्रकार की कृषि का चक्र चार से आठ वर्ष तक का होता है, कभी-कभी यह पांच से पन्द्रह वर्ष का भी होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानांतरण कृषि को विविध नामों से पुकारा जाता है, यथा- असम में झूम, केरल में पोणम, आंध्र प्रदेश और ओडीशा में पोडू तथा मध्य प्रदेश में बीवर, मशान, पॅण्डा और बीरा। इस प्रकार की कृषि मुख्यतः असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडीशा आदि के वन क्षेत्र में की जाती है। इसके अंतर्गत शुष्क धान, गेहूं, मक्का, चोरे ज्वार, तम्ब...